महात्मा ज्योतिबा फुले / Mahatma Jyotiba Phule ने ‘ब्रम्ह्नांचे कसब’, ‘गुलामगिरी’, ‘संसार’, ‘शेतकर्यांचा आसुड’, ‘शिवाजीचा पोवाडा’, ‘सार्वजनिक’, ‘सत्यधर्म पुस्तिका’, आदी ग्रंथ लिखे है.
ब्राम्हण ये भारत के बाहर से आये हुये आर्य है. और अछूत ये भारतीय ही है ऐसा सिध्दांत उन्होंने रखा. इस सिध्दांता की वजह से अभ्यासको में मतभेद है. फुले इन्होंने अपने पुरे लेखन में ब्राम्हणों पर जिन भाषा में टिका की है वो भी विवाद का विषय है. लेकिन ऐसी टिका करनेवाले फुले के ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ ये सबसे महत्त्वपूर्ण किताब की तरफ किसीका ध्यान ही नहीं था.
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भारतीय समाज की शोषण व्यवस्था खुली करके और जातीव्यवस्था अंत की लढाई खडी करके भी फुले इन्होंने समाज के समानता कही भी ठेस आने नहीं दी. इसलिये शायद महात्मा गांधी ने फुले को ‘सच्चा महात्मा’ ऐसा कहा है. तो डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें गुरु माना है.
महात्मा फुले इन्होंने अछूत स्त्रीयों और मेहनत करने वाले लोग इनके बाजु में जितनी कोशिश की जा सकती थी उतनी कोशिश जिंदगीभर फुले ने की है. उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, ब्रम्ह्नोत्तर आंदोलन, बहुजन समाज को आत्मसन्मान देणे की, किसानो के अधिकार की ऐसी बहोतसी लढाई यों को प्रारंभ किया. सत्यशोधक समाज ये भारतीय सामाजिक क्रांती के लिये कोशिश करनेवाली अग्रणी संस्था बनी. महात्मा फुले ने लोकमान्य टिळक , आगरकर, न्या. रानडे, दयानंद सरस्वती इनके साथ देश की राजनीती और समाजकारण आगे ले जाने की कोशिश की. जब उन्हें लगा की इन लोगों की भूमिका अछूत को न्याय देने वाली नहीं है. तब उन्होंने उनपर टिका भी की. यही नियम ब्रिटिश सरकार और राष्ट्रीय सभा और कॉग्रेस के लिये भी लगाया हुवा दिखता है.
कॉग्रेस को बहुजनाभिमुख और किसानो के हित की भूमिका लेने में मजबूर करने का श्रेय भी फुले को ही जाता है. महात्मा फुले का जीवन ये पूरा कोशिशो और संघर्षों से भरा हुवा दिखता है. उनकी मृत्यु 28 नवंबर 1890 को हुयी.
महात्मा फुले के बाद महाराष्ट्र में बहोत से सुधारक और विचारवंत होकर गये. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और महर्षी विठठल रामजी शिंदे ये उनमे से माने जाते है. इन दोनों ने भी महात्मा फुले के विचार अपने तरिके से आगे ले गये. बहुजन समाज ऐक्य का सैद्धांतिक विचार फुले के तत्त्वज्ञान में है ऐसा उस समय में कहा गया. भारत में जब तक जातिव्यवस्था और जातिधारित शोषण अस्तित्व में रहेंगा तबतक सामाजिक क्रांती के लिये लढने वाले इस कृतिशिल विचारवंत का स्मरण होता रहेंगा.
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