Friday, 26 August 2016

Mali samaj sheopur

माली समाज श्योपुर

Mali Samaj Sheopur

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फुलमलियान समाज के मन्दिर पर हुए 25 अगस्त 2016 को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर बेहतरीन प्रोग्राम हुआ और सजावट की गयी जो अन्य किसी मन्दिर पर नही और मालियान समाज का मन्दिर प्राचीन से बहुत सुंदर है और और इसकी सजावट फूलमाली समाज के लोगो ने उनको मेरा धन्यवाद और उन्होंने अच्छा कार्ये और इसका पूरा श्रय उनको जाता हैं

Wednesday, 17 August 2016


इस देश की महिलाओं में सावित्रीबाई ही प्रथम षिक्षित स्त्री, प्रथम अध्यापिका, भारत की सभी जातियों की प्रथम नेता और अस्पृष्यता का जमकर विरोध करने वाली प्रथम कार्यकर्त्री थी। महात्मा ज्योतिबा फुले के कार्यो में उनकी अटल निष्ठा थी। </p>
<p>श्रीमती फुलवताबाई झोडके (फुले दम्पती के जीवन संघर्ष से सुपरिचित मराठी लेखिका)
महात्मा ज्योतिराव फुले (11 अप्रेल 1827-28 नवम्बर 1890) की पत्नी श्रीमती सावित्रीबाई फुले (3 जनवरी 1831-10 मार्च 1897) न केवल भारत की प्रथम अध्यापिका थी, बल्कि वह नारी सामाजिक चेतना तथा आधुनिक शब्दावली में महिला सशक्तिकरण अवधारणा एवं आन्दोलन की आद्य प्रवर्तक थी। वह न केवल शूद्रातिशूद्रों तथा नारी शिक्षा आन्दोलन की साहसी अग्रदूत थी, बल्कि एक कुशल सामाजिक संगठनकर्ता भी थीं। वह न केवल महात्मा फुले की अटूट आस्थावान सहचर, सहभागी और अर्द्धागिनी थीं। बल्कि भारत की प्रथम महिला साहित्यकार (कृतिः काव्य फुले 1854) भी थीं। वह 19 वीं शताब्दी के भारतीय सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण एवं सांस्कृतिक नवोत्थान युग की प्रथम सामाजिक कर्मण्यवादी महिला विभूति थीं। कृतज्ञ राष्ट्र का यह सामाजिक दायित्व है कि वह सामाजिक क्रान्ति ज्योति सावित्रीबाई फुले की पुण्य स्मृति में उनकी जन्मतिथि (3 जनवरी) पर महिला साक्षरता दिवस तथा पुण्य तिथि का आयोजन महिला सशक्तिकरण दिवस के रूप में करें।</p>
<p><strong>जन्म और विवाहः </strong> महाराष्ट्र के एक छोटे-से ग्राम नायागांव (तहसील खंडाला, जिला सतारा) में 3 जनवरी 1831 को खंडोजी नेवसे पाटिल के परिवार में सावित्रीबाई का जन्म हुआ। धनकवाड़ी के पाटिल (गांव मुखिया) की बेटी सगुणाबाई क्षीरसागर महात्मा ज्योति बा फुले की मौसेरी बहन थी। वह बाल विधवा थी। उसने शिशु ज्योतिराव फुले का पालन-पोषण किया था। उसके प्रयत्नों से युवक ज्योति का विवाह नायगांव में सावित्रीबाई के साथ 1840 ई. में हुआ। उस समय युवक ज्योति की आयु 13 वर्ष और सावित्री की आयु 9 वर्ष थी।
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<p>सामाजिक कार्य:- ज्योतिबा और उनकी पत्नी सावित्रीबाई का सामाजिक कार्य अलग-अलग करके देखना असम्भव है। दोनों दो शरीर अवश्य थे, परन्तु उनकी आत्मा एक थी। ज्योतिबा मार्गदर्शक थे तो सावित्रीबाई सामाजिक क्रान्ति की ज्योति की वाहक थी। फुले दम्पति दो सामाजिक शक्तियों का एकाकार रूप था।
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फुले दम्पति ने नारी मुक्ति के लिए परम्परागत रूढ़ियों का खण्डन किया। सती प्रथा तथा विधवा मुंडन का विरोध तथा विधवा विवाह का समर्थन किया। सावित्रीबाई ने नारी शिक्षा के कार्य में ज्योतिबा का जो योगदान किया वह अक्षुण्ण है।
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फुले दम्पति ने जनवरी 1863 में विधवाओं के अवैध बच्चों के लालन-पालन के लिए सन् 1963 में बाल हत्या प्रतिबन्ध गृह खोला और विधवाओं की गुप्त तथा सुरक्षित प्रसूति के लिए प्रसूतिगृह खोला। प्रसूतिगृह में जन्में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राह्मण नारी के बच्चें (यशवन्त) को गोद लिया। बालक यशवन्त बाद में डॉक्टर बन गया। 4 फरवरी 1889 को उसका विवाह राधाबाई पुत्री कृष्णराय ससाणे से करके समाज सुधार का एक आदर्श प्रस्तुत किया। महाराष्ट्र में यहीं सर्वप्रथम अन्तर्जातीय विवाह था। ज्योतिबा के देहावसान के बाद आठ वर्षों तक सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज (स्थापना वर्ष सितम्बर 1873) का कार्यभार सम्भाला।

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साहित्य और विचार:- सावित्रीबाई श्रेष्ठ अध्यापिका, प्रभावशाली वक्ता, कुशल प्रशासिका, लेखिका और कवयित्री थी। उसका ‘काव्यफुले‘ शीर्षक काव्य संग्रह 1854 में प्रकाशित हुआ। उनके द्वारा रचित ग्रन्थ निम्न हैं:
1. काव्यफुले (1854),
2. मातुश्री सावित्रीबाईची भाषणे व वाणी - विषय उद्योग व विद्यादान (1891)
3. बावन कशी सुबोधरत्नाकर (काव्य संग्रह)
4. ज्योतिबांची भाषणे भाग 1 से 4 (सं. सावित्रीबाई)
5. सावित्रीबाई के विविध विषयों पर भाषण
6. सावित्रीबाई द्वारा ज्योतिबा को लिखे गए दो पत्र।


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<p>नारी चेतना की प्रणेता:- नारी शिक्षा के क्षेत्र में अपने ज्योतिबा को समर्पित भाव से सक्रिय सहयोग देकर सावित्रीबाई ने भारतीय नारी के इतिहास में एक नए अध्याय का सूत्रपात किया। इस सन्दर्भ में मामा परमानन्द ने 31 जुलाई 1890 को बड़ौदा रियासत के दीवान घामणस्कर को लिखे पत्र में कहा- ‘‘ज्योतिराव से भी अधिक उनकी पत्नी सावित्रीबाई की जितनी सराहना की जाए कम हैं। उन्होंने अपने पति को सम्पूर्ण सहयोग दिया, उनके साथ रहकर मुसीबतों का डटकर सामना किया, कष्ट तथा यातनाएं सहीं। ऊँचें वर्गों की उच्च शिक्षित महिलाओं में भी ऐसी त्यागी महिला विरला ही होगी। </p>
<p> निष्कर्ष:- भारत की प्रथम अध्यापिका बनकर उन्होंने नारी सामाजिक चेतना आन्दोलन का शुभारम्भ किया और यहीं से स्त्री मुक्ति आन्दोलन की गंगोत्री निकली। सावित्रीबाई ने शूद्रातिशूद्रों एवं स्त्री जाति को ज्ञान दान करके सामाजिक पुनर्जागरण के आधुनिक युग का द्वार सबके लिए खोला। वे महिला सशक्तिकरण अवधारणा की आद्य प्रवर्तक थीं। भारत सरकार के डाक विभाग ने 10 मार्च, 1998 को सावित्रीबाई फुले स्मारक डाक टिकट जारी करते हुए गौरव का अनुभव किया।

संत लिखमिदास जी महाराज ऐसे भक्त थे जिन्होने राजा जनक की तरह गृहस्थी जीवन के साथ भक्ति की।

जन्म - संत लिखमिदास जी का जन्म विक्रम संवत् 1807 आषाढ सुदी 15 (पूर्णिमा) 8 जुलाई 1750 को समुदास जी सोलंकी के घर श्रीमति नत्थी देवी के कोख में हुआ।</p>
<p> <strong>जन्म -</strong> संत लिखमिदास जी का जन्म विक्रम संवत् 1807
आषाढ सुदी 15 (पूर्णिमा) 8 जुलाई 1750 को समुदास जी सोलंकी के घर श्रीमति
नत्थी देवी के कोख में हुआ।</p>
<p><strong>विवाह:-</strong>
आपका विवाह परसरामजी टाक की पुत्री श्रीमति चैनी के साथ हुआ। आपके दो पुत्र और एक पुत्री थी बड़े पुत्र का नाम जगरामजी तथा छोटे पुत्र का नाम गेनदासजी तथा पुत्री का नाम बदिगेना था। धाम:- लिखमिदासजी महाराज की प्रधान धाम अमरपुरा गुरूद्वारा है, अन्य धामें देह, गुडला, ताऊसर, गोंआ आदि स्थान पर है आपके मंदिर शिवगंज, अहमदाबाद, मेड़माड़वास आदि स्थानों पर है।
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<strong>पर्चे और भजन:- </strong>
लिखमिदास जी महाराज ने सैकड़ों पर्चें दिये है और हजारों भजन तथा दोहों की रचना की है। आपके कुछ पर्चें निम्न प्रकार है। घोड़े से पैदल हाथ नही आना, अमरपुरा, को खाली करना, महाराज भीमसिंह जी को चारभुजा के दर्शन देना, हाकम द्वारा क्षमा माॅगकर आपको छोड़ना, बाड़ी में सिचाई करना, जैसलमेर में लड़के को जीवित करना, भगवान द्वारा खेत की कड़ब काटना, एक समय में दो गांवो में जागरण देना, जीवित समाधि की पूर्व में सूचना देना समाधि वाली वस्तुएॅ अहमदाबाद के मूल्ला का


समाधि:- 
लिखमिदास जी महाराज ने विक्रम संवत् 1887 आसोज बदी 6 (षष्टमी) 08 सितम्बर 1830 को ग्राम अमरपुरा जीवित समाधि ली। वर्तमान में आपकी धाम के महंत जीतुराम जी महाराज है। आपकी जयंती पूरे भारत वर्ष में मनाई जाती है।

सामाजिक क्रांति से अभिप्राय हिन्दू- हिन्दुत्व की परम्परागत सामाजिक, धार्मिक रूढ़िवादी कुरीतियों के विरूद्ध आंदोलन करने से है। सामाजिक क्रांति का प्रथम तथा अन्तिम लक्ष्य सामाजिक - धार्मिक पुनर्जागरण आंदोलन और सांस्कृतिक नवोत्थान की प्रक्रिया को गति एवं दिशा प्रदान करना हैं</p>
<p>भारत के धार्मिक-सामाजिक नवोत्थान के पुरोधाओं राजा राममोहन राय (1722-1833), महात्मा ज्येातिराव फुले (1827-1890), स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883), महादेव गोविन्द रानाडे (1942-1901) में से सामाजिक क्रांति के जनक के रूप में केवल महात्मा ज्योतिबा फुले की गणना की जा सकती है। महात्मा फुले के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होकर विनायक दामोदर सावरकर (1833-1966) तथा डॉ. भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) ने सामाजिक क्रांति के स्वर और आंदोलन को आगे बढाया।
डॉ. अम्बेडकर तो महात्मा फुले के व्यक्तित्व - कृतित्व से अत्यधिक प्रभावित थे। वे महात्मा फुले को अपने सामाजिक आन्दोलन की प्रेरणा का स्त्रोत मानते थे। 28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुम्बई में भाषण देते हुए उन्होने महात्मा बुद्ध तथा कबीर के बाद महात्मा ज्योतिबा फुले को अपना तीसरा गुरू माना है। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा- <strong>And my third Guru is Jyotiba Phooley. It is only phooley who taught the lessons of humanity. In earlier political movement, we all were going on the path of Jyotiba, my life is influenced by their teachings</strong>(अर्थात् मेरे तृतीय गुरू ज्योतिबा फुले है। केवल उन्होनें ही मानवता का पाठ पढाया। प्रारम्भिक राजनीतिक आन्दोलन में हमने ज्योतिबा के पथ का अनुसरण किया। मेरा जीवन उनसे प्रभावित हुआ है।)
गोविन्दराम-चिमणाबाई फुले दम्पति के परिवार में पुणे में 11 अप्रेल 1827 को ज्योति राव फुले का जन्म हुआ। उन्होने मराठी शिक्षा(1834-38) तथा बाद में स्कॉटिश मिशन स्कूल में अंग्रेजी शिक्षा (1841-47) प्राप्त की। 1840 में उनका विवाह 9 वर्षीय सावित्रि बाई (1831-1897) से हुआ। युवक फुले के व्यक्तित्व निर्माण में ईसाइयत के उदारवाद, अमेरिकी लेखक टामस पेन के ग्रंथ ‘राइट्स आफ मैन‘ तथा ‘दी एज ऑफ रीजन‘ का प्रभाव पड़ा। उन्होने अस्पृष्य जाति के लहू की मांग से तलवार-भाला आदि चलाने का शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। छत्रपति शिवाजी, वाशिंगटन और मार्टिन लूथर के जीवन चरित्रों के अध्ययन से युवक ज्योति स्वतंत्रता, समानता और उदारवादी चिंतन के प्रबल पक्षधर बने।</p>
<p>सामाजिक क्रांतिकारी और उनका सामाजिक चिंतन शून्य नहीं होता है। उसके ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ होते है। पुणे में 1848 में अपने ब्राह्मण मित्र सखाराम यशवंत परांजयें के विवाह में बाराती के रूप में शामिल होने पर एक रूढ़िवादी ब्राह्मण ने युवक ज्योति राव का घोर अपमान करते हुए कहा-‘अरे शूद्र! ब्राह्मणों के साथ चलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई? तूने तो जातीय व्यवस्था की सारी मर्यादाएं ही तोड दीं। ’ अपमानित युवक ज्योति राव ने यह अनुभव किया कि राजनीतिक दासता की तुलना में सामाजिक दासता अधिक अमानवीय और अपमानजनक होती है। इस प्रकार सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना उनके जीवन संघर्ष का प्राथमिक तथा अंतिम लक्ष्य बन गया।
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शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते हुए फुले दम्पती ने 1848 में सर्वप्रथम पुणें में बुधवार पेठ में श्री भिन्डे के मकान में अपनी प्रथम कन्याशाला प्रारम्भ की। कन्या शिक्षा विरोधी भू-देवों के विरोध के कारण फुले दम्पती को 1849 को अपना पितृ गृह छोड़ना पडा़। मुम्बई सरकार के अभिलेखों में ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे तथा उसके पास के क्षेत्रों में शूद्रादि बालक-बालिकाओं के लिये कुल 18 विद्यालय खोले जाने का उल्लेख मिलता है। 1855 में उन्होनें पुणें में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना की।
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ज्योतिबा ने 1851 में ‘फिमेल एज्यूकेषन सोसायटी’ तथा सितम्बर 1853 में ‘सोसायटी फॉर प्रमोटिंग दी एज्यूकेशन ऑफ महारस एंड मांगस’ की स्थापना करके शिक्षा प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया। कन्या शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान के कारण मुम्बई (महाराष्ट्र) सरकार की ओर से उन्हे पुणे के संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य मेजर कैंडी ने 16 नवम्बर 1852 को 193 रूपये के दो शॉल भेंट कर सम्मानित किया।
उन्होनें रूढ़िवादी सामाजिक- धार्मिक व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह किया। जैसेः-
 विधवा विवाह का समर्थन किया और महात्मा फुले ने एक शेनबी युवती का पुनर्विवाह 8 मार्च 1860 को कराया।
 बाल हत्या प्रतिबंधक गृह तथा विधवा प्रसूति गृह 1863 में खोला। इसमें एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई का प्रसव कराके 1874 में उसके पुत्र यशवंत को गोद लिया।
 बम्बई में नाइयों से यह प्रतिज्ञा करवाई कि वे विधवा मुंडन का कार्य नहीं करेगें।
 1866 में उन्होने अपने घर का कुऑं पानी पीने के लिये अतिशूद्रों के लिए खोल दिया।
 ज्येातिबा ने सत्यशोधक समाज की स्थापना 24 सितम्बर 1873 को की। यह उनके विचारों का संस्थाकरण था। इसके तत्वाधान में बिना ब्राह्मण पुरोहित के विवाह 25.12.1873 व 07.05.1874 को कराए। इस विवाह विषयक मुकदमें में ज्येातिबा फुले की जीत उस समय हुई, जब बम्बई उच्च न्यायालय ने जनवरी 1890 में इसे वैध घोषित कर दिया। यह निर्णय सुधारवाद के पक्ष में सामाजिक रूढ़िवाद की पराजय का प्रतीक था।
 ज्योतिबा पुणे में दयानन्द सरस्वती के जुलूस में शामिल हुए(सितम्बर 1875)
 मुम्बई मे 1890 में एक महिला को देवदासी (भगवान के साथ) होने से रोका। इससे मुम्बई में वैचारिक भूकम्प आ गया।

1855 में ज्योतिबा ने अपने नाटक तृतीय रत्न में ब्राह्मण वाद का घोर विरोध किया था। फलस्वरूप कट्टरवादियों ने उनकी हत्या के लिये 1856 में रामोशी रोड़ मांग और धोंडीराम नामदेव कुम्हार को 1000-1000 रूपये का प्रलोभन लेकर तैयार किया।
एक सामाजिक कर्मण्यवादी विचारक के रूप में ज्येातिबा की सम्पूर्ण महाराष्ट्र में पहचान स्थापित होने के कारण उन्हे पुणे नगरपालिका का सदस्य (1876-1880) मनोनीत किया गया। 11 मई 1888 को बम्बई में मांडवी स्थित कोलीबाड़ा के सभागार में समाज के सभी वर्गों ने सार्वजनिक अभिनन्दन किया। उन्हें महात्मा की जनउपाधि से विभूषित किया गया।
 साहित्य और विचार:-महात्मा फुले भारत के प्रथम सामाजिक क्रांतिकारी थे जिन्होनें हंटर आयोग(1882) को प्रस्तुत स्मृति पत्र में शिक्षा के फिल्टर डाउन सिद्धान्त का विरोध करते हुए अनिवार्य शिक्षा पर बल दिया। उन्होनें किसान का कोडा़ (1883 परन्तु 1967 में प्रकाशित) में किसानों तथा कृषि व्यवस्था की दुर्दषा के लिये ऋणग्रस्तता, अनावश्यक लगान, जनसंख्या का कृषि भूमि पर दबाव, स्वदेी हस्तशिल्प का पतन, विलायती ऋण तथा ब्याज, सिंचाई हेतु बांधों का अभाव, नमक कर और अविद्या को सब अनर्थों का मूल बताया। उन्होनें पशु नस्ल सुधार तथा भारतीय किसानों को प्रशिक्षण हेतु इंग्लैण्ड भेजने और प्रतिवर्ष किसान सम्मेलन के आयोजन पर बल दिया।
महात्मा फुले ने अपनी प्रत्येक पुस्तक में शूद्राति शूद्रों के शोषण का विरोध करते हुए सामाजिक समानता का समर्थन किया । उन्होनें गुलामगिरी (1873) में लिखा - ‘‘ हर मनुष्य को आजाद होना चाहिए, यही उसकी बुनियादी जरूरत है। आजाद होने से मनुष्य अपने सभी मानवीय अधिकार प्राप्त कर लेता है और असीम आनन्द का अनुभव करता है।’’ उन्होनें अपनी पुस्तक ‘‘ सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक’’ (1898) में ‘अल्लाह, गॉड, ईष्वर तथा ब्रह्म ’ के स्थान पर ‘निर्माण कर्ता शब्द का प्रयोग किया। वे प्रथम राष्ट्रवादी थे जिन्होने 1869 में छत्रपति शिवाजी की समाधी की खोज रायगढ़ में की। महात्मा फुले श्रमिक आन्दोलन के भी संस्थापक थे।
 महात्मा फुले सामाजिक-ऐतिहासिक अन्तर्दृष्टि के धनी प्रथम सामाजिक शक्ति थे जिन्होने सर्वप्रथम अपनी पुस्तक सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगल गाथाएं में तथा पत्र व्यवहार में ‘सत्यमेव जयते’ शब्द का प्रयोग किया। बाद में 26 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे अपनाया।
 जीवन पर्यन्त दलित वर्ग के उत्थान तथा सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के विरूद्ध संघर्ष करते रहना ही महात्मा फुले के जीवन की कर्मरेखा और भाग्य रेखा थी। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले के संघर्षपूर्ण जीवन का अन्त हुआ। 3 नवम्बर 2003 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद भवन के परिसर में महात्मा फुले की प्रतिमा का अनावरण करके उनके व्यक्तिव- कृतित्व को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान की।

Friday, 12 August 2016

Mali samaj Sheopur

महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। उनकी माता का नाम चिमणाबाई तथा पिता का नाम गोविन्दराव था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले माली का काम करता था। वे सातारा से पुणे फूल लाकर फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करते थे इसलिए उनकी पीढ़ी 'फुले' के नाम से जानी जाती थी।

ज्योतिबा बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने मराठी में अध्ययन किया। वे महान क्रांतिकारी, भारतीय विचारक, समाजसेवी, लेखक एवं दार्शनिक थे। 1840 में ज्योतिबा का विवाह सावित्रीबाई से हुआ था।

महाराष्ट्र में धार्मिक सुधार आंदोलन जोरों पर था। जाति-प्रथा का विरोध करने और एकेश्‍वरवाद को अमल में लाने के लिए ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना की गई थी जिसके प्रमुख गोविंद रानाडे और आरजी भंडारकर थे।

उस समय महाराष्ट्र में जाति-प्रथा बड़े ही वीभत्स रूप में फैली हुई थी। स्त्रियों की शिक्षा को लेकर लोग उदासीन थे, ऐसे में ज्योतिबा फुले ने समाज को इन कुरीतियों से मुक्त करने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाए। उन्होंने महाराष्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा तथा अछूतोद्धार का काम आरंभ किया था। उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए भारत की पहला विद्यालय खोला।

इन प्रमुख सुधार आंदोलनों के अतिरिक्त हर क्षेत्र में छोटे-छोटे आंदोलन जारी थे जिसने सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर लोगों को परतंत्रता से मुक्त किया था। लोगों में नए विचार, नए चिंतन की शुरुआत हुई, जो आजादी की लड़ाई में उनके संबल बने।

इस महान समाजसेवी ने अछूतोद्धार के लिए सत्यशोधक समाज स्थापित किया था। उनका यह भाव देखकर 1888 में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी गई थी। ज्योतिराव गोविंदराव फुले की मृत्यु 28 नवंबर 1890 को पुणे में हुई।

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Mali samaj Sheopur

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महात्मा ज्योतिबा फुले ( १८२७ – १८९० )
महात्मा ज्योतिबा फूले का जन्म पुणे के एक माली परिवार में सन् 1827 में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविन्दराव व माता का नाम चिमणाबाई था। इनके पूर्वज जीवन-यापन हेतु फूलो के हार व गजरे आदि बनाते थे, इसलिये लोग इन्हें फूले कहकर संबोधित करते थे। ज्योतिबा के जन्म के एक वर्ष बाद ही उनकी माता का देहान्त हो गया। बच्चों के भविष्य को देखते हुए उनके पिता ने पुनर्विवाह नहीं किया व स्वयं उनके लालन-पालन ने रूचि ली। ज्योतिबा बहुत बुद्धिमान बालक थे। लोगों ने गोविन्दराव से उन्हें विद्यालय में दाखिल करने को कहा। ज्योतिबा भी विद्यालय जाने को उत्सुक थे। उन दिनों पुणे में एक ही विद्यालय था। जिसकी स्थापना तत्कालीन कलेक्टर राबर्टसन ने की थी। उनमें बडे-बडे अमीरों बच्चें पढते थे। ज्योतिबा पढने में बहुत तेज थे। चार साल तक उनकी पढाई चलती रही। विद्यालय अंगे्रजो का था। लोगो ने यह अफवाह फैलाई कि इसमें बच्चों को ईसाई बनाया जाता है। गोविन्दराव ने सच मानकर ज्योतिबा को विद्यालय से निकाल लिया। अब ज्योतिबा फिर माली का काम करने लगे। लेकिन उनका मन तो पढने में था। हाथ में डंडा लेकर वह मिट्टी पर लिखते थे और पिछला पढा हुआ दोहराते थे। विद्यालय जाने वाले बच्चों को देखकर वह कहते थे कि मैं भी विद्यालय जाउंगा। पडौस में एक अंग्रेज सज्जन रहते थे। उनको ज्योतिबा पर तरस आ गया और उन्होेंने गोविन्दराव को समझाकर ज्योतिबा को फिर विद्यालय में दाखिल करवा दिया। बीच में पढाई छुट जाने के कारण अब ज्योतिबा अपनी कक्षा में सबसे बडी उम्र के थे। इसलिये उन्हें बडी शर्म आती थी। फिर भी मेहनत करके उन्होंने पिछली सारी पढाई पूरी कर ली। विद्यालय में ज्योतिबा को स्वतन्त्रता, समता, बंधुत्व, अहिंसा आदि आदर्शो का परिचय मिला। महात्माओं के जीवन सार को पढकर उन्होंने दया, धर्म, प्रेम और सत्य का महत्व समझा। भगवान के सामने अमीर-गरीब और ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं है, उन्होंने यह भी सीखा। परन्तु उनको सत्य, दया, धर्म क्षमा आदि कहीं भी दिखाई न दिये। लोग एक-दूसरे को लूटते थे, धर्म और जाति का भेद बहुत माना जाता है। यह सब देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। एक बार ज्योतिबा अपने दोस्त की शादी में गये। वहां एक ब्राह्मण पुरोहित ने उन्हें बारात में सम्मिलित होने से रोक लिया। शादी में विघ्न नहीं डालना चाहिए, यह सोचकर ज्योतिबा अलग हो गये। लेकिन यह अपमान बहुत दिनों तक उनके मन में कांटे की तरह चुभता रहा। इस घटना ने ज्योतिबा को गंभीरता से सोचने और सामाजिक स्थिति का अध्ययन करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने पाया कि अछूत कहे जाने वाले निचले वर्ग के लोगो की स्थिति जानवरों से भी गई-बीती है। लोग अज्ञान और दरिद्रता से पीडित है, ज्योतिबा मैट्रिक पास थे। तब घर के लोग चाहते थे वे अच्छे वेतन पर सरकारी कर्मचारी हो जाए लेकिन ज्योतिबा ने अपना सारा जीवन दलितों की सेवा में बिताने का निश्चय किया। उन दिनों स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब थी। चैका-बर्तन करना और बच्चों को संभलना, बस इतना ही उनका दायरा था। बचपन में शादी हो जाती थी और पढने-लिखने का सवाल ही नहीं उठता था। दुर्भाग्य से अगर कोई बचपन में विधवा हो जाती थी तो बडा अन्याय होता था। भावी पीढी का निर्माण करने वाली माताएं अगर अंधकार में डूबी रही तो देश का क्या होगा ? पीढी दर पीढी अंधकार ही फैला रहेगा और देश की कोई भी पीढी सबल, शिक्षित नहीं हो सकेगी। वह इस परिणाम पर पहंुचे कि यदि बच्चें की माँ पढी-लिखी होगी, तभी वह संतान को ज्ञान का प्रकाश दे सकेगी।

महात्मा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ने के बाद १८४८  में उन्होंने पुणे में लडकियों के लिए भारत की पहली प्रशाला खोली | २४ सितंबर १८७३ को उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की | वह इस संस्था के पहले कार्यकारी व्यवस्थापक तथा कोषपाल भी थे |इस संस्था का मुख्य  उद्देश्य समाज में शुद्रो पर हो रहे शोषण तथा दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाना था |
ज्योतिबा फूले ने 1854 में लडकियों के लिए विद्यालय खोला। समूचे भारत में लडकियों का यह पहला विद्यालय था। प्रारम्भ में आठ लडकियों ने ही विद्यालय में प्रवेश लिया था, मगर धीरे-धीरे यह संख्या बढती गई। विद्यालय में वे ही अकेले शिक्षक थे, क्योंकि लोग दूसरे शिक्षकों को वहां पर नहीं आने देते थे। अकेले परिश्रम करते हुए वह थक जाते थे, इसलिये सबसे पहला काम ज्योतिबा ने यह किया कि अपनी पत्नी सावित्री को शिक्षा दी। अब पढाई के काम में वह भी मदद करने लगी। रास्ते में लोग सावित्रीबाई पर फब्तियां कसते लेकिन वह डगमगाई नहीं, धीरज से पढती और लडकियों को पढाती रही। लोगो के धमकाने से उनके पिता ने ज्योतिबा और सावित्री को घर से निकाल दिया।
अब ज्योतिबा ठेकेइदारी का काम करके जीविका चलाने लगे और बाकी समय समाज सेवा में लगाने लगे। उन्होंने शिक्षा का प्रचार करते हुए अनेक कन्या विद्यालय खोले। इसके बाद ज्योतिबा ने अछूते कहे जाने वाले लोगो के लिए ज्ञान मंदिर खोला। कितने ही अनाथ बच्चों को अपने ही घर पालना शुरू कर दिया। पूर्ण में सार्वजनिक पानी की टंकी थी। लेकिन अछूतों के लिए उसे छूना मना था। उन्हें घंटो धुप में खडे होकर पानी की भीख मांगनी पडती थी। ज्योतिबा को यह बुरा लगा। उन्होंने अपने घर की टंकी सबके लिए खोल दी। लोगो ने चिढकर उन्हें जाति से बाहर निकाल दिया। एक बार एक बुढा मेहतर रास्ते में बेहोश पडा था। पडौस में एक ब्राह्मण की कोठी थी, लेकिन किसी ने उसे पानी तक नहीं पिलाया। ज्योतिबा ने दूर से पानी लाकर उसे पिलाया और हाथ पकडकर घर पहुंचा दिया। एक बार एक भिखारी अपनी फटी-पुरानी धोती में भिक्षा बांधकर जा रहा था। अनाज रास्ते में बिखरता जाता था। ज्योतिबा ने उसे अपना दुपट्टा दे दिया। ज्येातिबा नेकी और भलाई के ऐसे अनेक काम करते थे। एक दिन कुछ लोगो ने ज्योतिबा के गले में मरे हुए सांप और बिच्छूओं की माला डाल दी पर ज्योतिबा ने उनको क्षमा कर दिया।������������������������������������

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जरूर पढे आपको पता लगेगा कि माली समाज के राष्ट्र्पिता कैसे थे
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पेशवाई के अस्त के बाद अंग्रेजी हुकूमत की वजह से हुये बदलाव के इ.स. 1840 के बाद दृश्य स्वरूप आया. हिंदू समाज के सामाजिक रूढी, परंपरा के खिलाफ बहोत से सुधारक आवाज उठाने लगे. इन सुधारको ने स्त्री शिक्षण, विधवा विवाह, पुनर्विवाह, संमतीवय, बालविवाह आदी. सामाजिक विषयो पर लोगों को जगाने की कोशिश की. लेकीन उन्नीसवी सदिके ये सुधारक ‘हिंदू परंपरा’ के वर्ग में अपनी भूमिका रखते थे. और समाजसुधारणा की कोशिश करते थे. महात्मा जोतिराव फुले / Mahatma Jyotirao Phule इन्होंने भारत के इस सामाजिक आंदोलन से महराष्ट्र में नई दिशा दी. उन्होंने वर्णसंस्था और जातीसंस्था ये शोषण की व्यवस्था है और जब तक इनका पूरी तरह से ख़त्म नहीं होता तब तक एक समाज की निर्मिती असंभव है ऐसी स्पष्ट भूमिका रखी. ऐसी भूमिका लेनेवाले वो पहले भारतीय थे. जातीव्यवस्था निर्मूलन के कल्पना और आंदोलन के उसी वजह से वो जनक साबीत हुये.

काम करने वाले स्त्री और अछूत जनता का कई शतको से हो रहे शोषण की और सामाजिक गुलामगिरी की उन्होंने ऐतिहासिक विरोध किया. सावकार और नोकरशाही इन के खिलाफ उन्होंने लढाई शुरू की. महात्मा फुले ने 21 साल की उम्र में लड़कियों के लिये स्कुल खोला. भारत के पाच हजार सालो के इतिहास में लड़कियों के लिये ये पहला स्कुल था. लड़कियों ने और अस्पृश्यों ने शिक्षा लेना मतलब धर्म भ्रष्ट करना ऐसा समझ उस समय था. उसके बाद ही उन्होंने 1851 में अछूत के लिये स्कुल खोला. उन्होंने पुना में स्त्री अछूत के लिये कुल छे स्कुल चलाये. लेकीन उनके इन कोशिशो को सनातन लोगों की तरफ से प्रखरता से विरोध हुवा. लेकीन फुले ने अपने कोशिश कभी नहीं रुकने दी. अपने आंगन का कुवा अस्पृश्यों के लिये खुला करके उन्हें पानी भरने देना, बालविवाह को विरोध करना, विधवा विवाह का समर्थन करना, मुंडन की रूढी बंद करने के लिये नांभिको का उपोषण करवाना ऐसे बहोत से पहल महात्मा फुले ने किये

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महात्मा ज्योतिबा फुले / Mahatma Jyotiba Phule ने ‘ब्रम्ह्नांचे कसब’, ‘गुलामगिरी’, ‘संसार’, ‘शेतकर्यांचा आसुड’, ‘शिवाजीचा पोवाडा’, ‘सार्वजनिक’, ‘सत्यधर्म पुस्तिका’, आदी ग्रंथ लिखे है.
ब्राम्हण ये भारत के बाहर से आये हुये आर्य है. और अछूत ये भारतीय ही है ऐसा सिध्दांत उन्होंने रखा. इस सिध्दांता की वजह से अभ्यासको में मतभेद है. फुले इन्होंने अपने पुरे लेखन में ब्राम्हणों पर जिन भाषा में टिका की है वो भी विवाद का विषय है. लेकिन ऐसी टिका करनेवाले फुले के ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ ये सबसे महत्त्वपूर्ण किताब की तरफ किसीका ध्यान ही नहीं था.

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भारतीय समाज की शोषण व्यवस्था खुली करके और जातीव्यवस्था अंत की लढाई खडी करके भी फुले इन्होंने समाज के समानता कही भी ठेस आने नहीं दी. इसलिये शायद महात्मा गांधी ने फुले को ‘सच्चा महात्मा’ ऐसा कहा है. तो डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने उन्हें गुरु माना है.

महात्मा फुले इन्होंने अछूत स्त्रीयों और मेहनत करने वाले लोग इनके बाजु में जितनी कोशिश की जा सकती थी उतनी कोशिश जिंदगीभर फुले ने की है. उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, ब्रम्ह्नोत्तर आंदोलन, बहुजन समाज को आत्मसन्मान देणे की, किसानो के अधिकार की ऐसी बहोतसी लढाई यों को प्रारंभ किया. सत्यशोधक समाज ये भारतीय सामाजिक क्रांती के लिये कोशिश करनेवाली अग्रणी संस्था बनी. महात्मा फुले ने लोकमान्य टिळक , आगरकर, न्या. रानडे, दयानंद सरस्वती इनके साथ देश की राजनीती और समाजकारण आगे ले जाने की कोशिश की. जब उन्हें लगा की इन लोगों की भूमिका अछूत को न्याय देने वाली नहीं है. तब उन्होंने उनपर टिका भी की. यही नियम ब्रिटिश सरकार और राष्ट्रीय सभा और कॉग्रेस के लिये भी लगाया हुवा दिखता है.

कॉग्रेस को बहुजनाभिमुख और किसानो के हित की भूमिका लेने में मजबूर करने का श्रेय भी फुले को ही जाता है. महात्मा फुले का जीवन ये पूरा कोशिशो और संघर्षों से भरा हुवा दिखता है. उनकी मृत्यु 28 नवंबर 1890 को हुयी.

महात्मा फुले के बाद महाराष्ट्र में बहोत से सुधारक और विचारवंत होकर गये. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और महर्षी विठठल रामजी शिंदे ये उनमे से माने जाते है. इन दोनों ने भी महात्मा फुले के विचार अपने तरिके से आगे ले गये. बहुजन समाज ऐक्य का सैद्धांतिक विचार फुले के तत्त्वज्ञान में है ऐसा उस समय में कहा गया. भारत में जब तक जातिव्यवस्था और जातिधारित शोषण अस्तित्व में रहेंगा तबतक सामाजिक क्रांती के लिये लढने वाले इस कृतिशिल विचारवंत का स्मरण होता रहेंगा.������������������������������������������������������

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����शुभरात्रि����

��कोलकत्ता में काली��

��हिन्दुस्तान में माली ��

��और जहा नाहो माली��

��वहाँ की दुनिया ख़ाली��

��फुलेब्रिगेड टीम श्योपुर��
��जय जोयतिबा फुले जी��
��जय जोयति��
��जय   क्रांति��

��Pवन सुमन श्योपुर��

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महात्मा ज्योतीबा फुले जी

आज लड़कीयों के हाथ मै किताब है उनकी वजह से उन्होने ने खुद उनकी पत्नी को पढाया और सभी औरतों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया

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चलता रहा हुँ अग्निपथ पर, चलता चला जाऊँगा .
"माली"बन कर जन्म लिया मै ने
"माली"बन कर मर जाऊँगा....
"महात्मा फुले"का शिष्य हुँ ,रूकना मैने सीखा नहीं .
"महात्मा फुले" का भक्त हुँ ,झुकना मैने सीखा नहीं...
ह्रदय में जो धड़क रहा है ,वो धड़कन तेरे नाम का ,,
रगो में जो बह रहा हैं ...
वो लहू हैं 'फुले "का !!!

��" फुले ब्रिगेड"��
���� Pavan Suman ����

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सभी फूलमाली भाइयो से निवेदन है कल सुबह दस बजे माली में मन्दिर पर फुलेब्रिगेड टीम का सदस्यता अभियान है आप सभी को आना है और उसमे बढ़चढ़ भाग लेना और माली एकता दिखाना है
फुलेब्रिगेड टीम माली समाज का राष्ट्रीय संगठन ।
युवा जोश, युवा उमंग, आओ साथ चले हम

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��अगर एक गुलाब देने से प्यार हो जाता
तो माली सारे शहर का यार होता.��

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इस वेबसाइट को बनाने में हमारा प्रथम उद्देश्य सभी माली
परिवारों को एकजुट करना है। हमारी सोच यह है के हम
सभी को एकजुट करे और हर समस्या का हल निकाल पाने
की क्षमता रखने वाला एक ऐसा समाज बनाये, जो सबसे
विकसित हो! और इस कार्य को करने के लिए हमारा
एकजुट होना बहुत ज़रूरी है!जैसे -जैसे बंधु जुड़ रहे हैं ,नयी-नयी
योजनाये एवं नए सुविचार मिल रहे हैं! आगे आने वाले कुछ ही
समय में "माली समाज " एक ऐसा आदर्श मंच होगा-'आपके
अपनों का,आपके सपनो का'! अंत में मैं सभी माली समाज
के लोगों का इस मिशन में समर्थन का अनुरोध करता हूं. इस
प्रकार हम फिर से एक "आदर्श माली समाज " का निर्माण
कर सकते हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए ये एक
वरदान होगा और सभी की याद होगी!आप सभी
सहयोगियों के प्रति हम ह्रदय से आभारी हैं!
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फुलेब्रिगेड 2018

फुले ब्रिगेड ने मंथन कर निर्णय लिया कि  समाज एक साथ एक तरफ करेगा  वोटिंग