Friday, 12 August 2016

Mali samaj sheopur

जरूर पढे आपको पता लगेगा कि माली समाज के राष्ट्र्पिता कैसे थे
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पेशवाई के अस्त के बाद अंग्रेजी हुकूमत की वजह से हुये बदलाव के इ.स. 1840 के बाद दृश्य स्वरूप आया. हिंदू समाज के सामाजिक रूढी, परंपरा के खिलाफ बहोत से सुधारक आवाज उठाने लगे. इन सुधारको ने स्त्री शिक्षण, विधवा विवाह, पुनर्विवाह, संमतीवय, बालविवाह आदी. सामाजिक विषयो पर लोगों को जगाने की कोशिश की. लेकीन उन्नीसवी सदिके ये सुधारक ‘हिंदू परंपरा’ के वर्ग में अपनी भूमिका रखते थे. और समाजसुधारणा की कोशिश करते थे. महात्मा जोतिराव फुले / Mahatma Jyotirao Phule इन्होंने भारत के इस सामाजिक आंदोलन से महराष्ट्र में नई दिशा दी. उन्होंने वर्णसंस्था और जातीसंस्था ये शोषण की व्यवस्था है और जब तक इनका पूरी तरह से ख़त्म नहीं होता तब तक एक समाज की निर्मिती असंभव है ऐसी स्पष्ट भूमिका रखी. ऐसी भूमिका लेनेवाले वो पहले भारतीय थे. जातीव्यवस्था निर्मूलन के कल्पना और आंदोलन के उसी वजह से वो जनक साबीत हुये.

काम करने वाले स्त्री और अछूत जनता का कई शतको से हो रहे शोषण की और सामाजिक गुलामगिरी की उन्होंने ऐतिहासिक विरोध किया. सावकार और नोकरशाही इन के खिलाफ उन्होंने लढाई शुरू की. महात्मा फुले ने 21 साल की उम्र में लड़कियों के लिये स्कुल खोला. भारत के पाच हजार सालो के इतिहास में लड़कियों के लिये ये पहला स्कुल था. लड़कियों ने और अस्पृश्यों ने शिक्षा लेना मतलब धर्म भ्रष्ट करना ऐसा समझ उस समय था. उसके बाद ही उन्होंने 1851 में अछूत के लिये स्कुल खोला. उन्होंने पुना में स्त्री अछूत के लिये कुल छे स्कुल चलाये. लेकीन उनके इन कोशिशो को सनातन लोगों की तरफ से प्रखरता से विरोध हुवा. लेकीन फुले ने अपने कोशिश कभी नहीं रुकने दी. अपने आंगन का कुवा अस्पृश्यों के लिये खुला करके उन्हें पानी भरने देना, बालविवाह को विरोध करना, विधवा विवाह का समर्थन करना, मुंडन की रूढी बंद करने के लिये नांभिको का उपोषण करवाना ऐसे बहोत से पहल महात्मा फुले ने किये

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