Friday, 12 August 2016

Mali samaj Sheopur

����������������महात्मा ज्योतिबा फुले
महात्मा ज्योतिबा फुले ( १८२७ – १८९० )
महात्मा ज्योतिबा फूले का जन्म पुणे के एक माली परिवार में सन् 1827 में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविन्दराव व माता का नाम चिमणाबाई था। इनके पूर्वज जीवन-यापन हेतु फूलो के हार व गजरे आदि बनाते थे, इसलिये लोग इन्हें फूले कहकर संबोधित करते थे। ज्योतिबा के जन्म के एक वर्ष बाद ही उनकी माता का देहान्त हो गया। बच्चों के भविष्य को देखते हुए उनके पिता ने पुनर्विवाह नहीं किया व स्वयं उनके लालन-पालन ने रूचि ली। ज्योतिबा बहुत बुद्धिमान बालक थे। लोगों ने गोविन्दराव से उन्हें विद्यालय में दाखिल करने को कहा। ज्योतिबा भी विद्यालय जाने को उत्सुक थे। उन दिनों पुणे में एक ही विद्यालय था। जिसकी स्थापना तत्कालीन कलेक्टर राबर्टसन ने की थी। उनमें बडे-बडे अमीरों बच्चें पढते थे। ज्योतिबा पढने में बहुत तेज थे। चार साल तक उनकी पढाई चलती रही। विद्यालय अंगे्रजो का था। लोगो ने यह अफवाह फैलाई कि इसमें बच्चों को ईसाई बनाया जाता है। गोविन्दराव ने सच मानकर ज्योतिबा को विद्यालय से निकाल लिया। अब ज्योतिबा फिर माली का काम करने लगे। लेकिन उनका मन तो पढने में था। हाथ में डंडा लेकर वह मिट्टी पर लिखते थे और पिछला पढा हुआ दोहराते थे। विद्यालय जाने वाले बच्चों को देखकर वह कहते थे कि मैं भी विद्यालय जाउंगा। पडौस में एक अंग्रेज सज्जन रहते थे। उनको ज्योतिबा पर तरस आ गया और उन्होेंने गोविन्दराव को समझाकर ज्योतिबा को फिर विद्यालय में दाखिल करवा दिया। बीच में पढाई छुट जाने के कारण अब ज्योतिबा अपनी कक्षा में सबसे बडी उम्र के थे। इसलिये उन्हें बडी शर्म आती थी। फिर भी मेहनत करके उन्होंने पिछली सारी पढाई पूरी कर ली। विद्यालय में ज्योतिबा को स्वतन्त्रता, समता, बंधुत्व, अहिंसा आदि आदर्शो का परिचय मिला। महात्माओं के जीवन सार को पढकर उन्होंने दया, धर्म, प्रेम और सत्य का महत्व समझा। भगवान के सामने अमीर-गरीब और ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं है, उन्होंने यह भी सीखा। परन्तु उनको सत्य, दया, धर्म क्षमा आदि कहीं भी दिखाई न दिये। लोग एक-दूसरे को लूटते थे, धर्म और जाति का भेद बहुत माना जाता है। यह सब देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। एक बार ज्योतिबा अपने दोस्त की शादी में गये। वहां एक ब्राह्मण पुरोहित ने उन्हें बारात में सम्मिलित होने से रोक लिया। शादी में विघ्न नहीं डालना चाहिए, यह सोचकर ज्योतिबा अलग हो गये। लेकिन यह अपमान बहुत दिनों तक उनके मन में कांटे की तरह चुभता रहा। इस घटना ने ज्योतिबा को गंभीरता से सोचने और सामाजिक स्थिति का अध्ययन करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने पाया कि अछूत कहे जाने वाले निचले वर्ग के लोगो की स्थिति जानवरों से भी गई-बीती है। लोग अज्ञान और दरिद्रता से पीडित है, ज्योतिबा मैट्रिक पास थे। तब घर के लोग चाहते थे वे अच्छे वेतन पर सरकारी कर्मचारी हो जाए लेकिन ज्योतिबा ने अपना सारा जीवन दलितों की सेवा में बिताने का निश्चय किया। उन दिनों स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब थी। चैका-बर्तन करना और बच्चों को संभलना, बस इतना ही उनका दायरा था। बचपन में शादी हो जाती थी और पढने-लिखने का सवाल ही नहीं उठता था। दुर्भाग्य से अगर कोई बचपन में विधवा हो जाती थी तो बडा अन्याय होता था। भावी पीढी का निर्माण करने वाली माताएं अगर अंधकार में डूबी रही तो देश का क्या होगा ? पीढी दर पीढी अंधकार ही फैला रहेगा और देश की कोई भी पीढी सबल, शिक्षित नहीं हो सकेगी। वह इस परिणाम पर पहंुचे कि यदि बच्चें की माँ पढी-लिखी होगी, तभी वह संतान को ज्ञान का प्रकाश दे सकेगी।

महात्मा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ने के बाद १८४८  में उन्होंने पुणे में लडकियों के लिए भारत की पहली प्रशाला खोली | २४ सितंबर १८७३ को उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की | वह इस संस्था के पहले कार्यकारी व्यवस्थापक तथा कोषपाल भी थे |इस संस्था का मुख्य  उद्देश्य समाज में शुद्रो पर हो रहे शोषण तथा दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाना था |
ज्योतिबा फूले ने 1854 में लडकियों के लिए विद्यालय खोला। समूचे भारत में लडकियों का यह पहला विद्यालय था। प्रारम्भ में आठ लडकियों ने ही विद्यालय में प्रवेश लिया था, मगर धीरे-धीरे यह संख्या बढती गई। विद्यालय में वे ही अकेले शिक्षक थे, क्योंकि लोग दूसरे शिक्षकों को वहां पर नहीं आने देते थे। अकेले परिश्रम करते हुए वह थक जाते थे, इसलिये सबसे पहला काम ज्योतिबा ने यह किया कि अपनी पत्नी सावित्री को शिक्षा दी। अब पढाई के काम में वह भी मदद करने लगी। रास्ते में लोग सावित्रीबाई पर फब्तियां कसते लेकिन वह डगमगाई नहीं, धीरज से पढती और लडकियों को पढाती रही। लोगो के धमकाने से उनके पिता ने ज्योतिबा और सावित्री को घर से निकाल दिया।
अब ज्योतिबा ठेकेइदारी का काम करके जीविका चलाने लगे और बाकी समय समाज सेवा में लगाने लगे। उन्होंने शिक्षा का प्रचार करते हुए अनेक कन्या विद्यालय खोले। इसके बाद ज्योतिबा ने अछूते कहे जाने वाले लोगो के लिए ज्ञान मंदिर खोला। कितने ही अनाथ बच्चों को अपने ही घर पालना शुरू कर दिया। पूर्ण में सार्वजनिक पानी की टंकी थी। लेकिन अछूतों के लिए उसे छूना मना था। उन्हें घंटो धुप में खडे होकर पानी की भीख मांगनी पडती थी। ज्योतिबा को यह बुरा लगा। उन्होंने अपने घर की टंकी सबके लिए खोल दी। लोगो ने चिढकर उन्हें जाति से बाहर निकाल दिया। एक बार एक बुढा मेहतर रास्ते में बेहोश पडा था। पडौस में एक ब्राह्मण की कोठी थी, लेकिन किसी ने उसे पानी तक नहीं पिलाया। ज्योतिबा ने दूर से पानी लाकर उसे पिलाया और हाथ पकडकर घर पहुंचा दिया। एक बार एक भिखारी अपनी फटी-पुरानी धोती में भिक्षा बांधकर जा रहा था। अनाज रास्ते में बिखरता जाता था। ज्योतिबा ने उसे अपना दुपट्टा दे दिया। ज्येातिबा नेकी और भलाई के ऐसे अनेक काम करते थे। एक दिन कुछ लोगो ने ज्योतिबा के गले में मरे हुए सांप और बिच्छूओं की माला डाल दी पर ज्योतिबा ने उनको क्षमा कर दिया।������������������������������������

No comments:

Post a Comment

फुलेब्रिगेड 2018

फुले ब्रिगेड ने मंथन कर निर्णय लिया कि  समाज एक साथ एक तरफ करेगा  वोटिंग